Saturday, October 3, 2026

जे तलफो कोई जीव, मुगत कूं तलफिये।

 

मनुष्य के भीतर तड़प, रोना, चिंता और महत्वाकांक्षा जैसी भावनाएँ स्वाभाविक रूप से होती हैं, परंतु अज्ञान के कारण वह इन भावनाओं को 'नाशवान संसार और माया' पर खर्च कर देता है। एक सच्चे साधक को अपनी इन सभी भावनाओं की दिशा मोड़कर (Redirect करके) इन्हें 'परमात्मा और मोक्ष' की ओर लगा देना चाहिए। 
 
 जे तलफो कोई जीव, मुगत कूं तलफिये। 
झूठी माया ही काज, मती कोई कलपिये ।। १ ।। 
 हे जीव! यदि तेरे भीतर 'तड़प' (बेचैनी या तीव्र इच्छा) उठती ही है, तो तुझे जन्म-मरण के चक्र से 'मुक्ति' (मोक्ष) पाने के लिए तड़पना चाहिए। यह धन-दौलत, पद और प्रतिष्ठा सब 'झूठी माया' है, जो मृत्यु के साथ यहीं छूट जाएगी। इसलिए इस नश्वर माया को पाने के लिए या इसके छिन जाने पर व्यर्थ ही मत 'कलप' (संताप मत कर, मत घबरा)। सांसारिक चीजों के लिए कलपना अज्ञानता है। 
 
 जे बिरह किजे जोय, सांई कूं मोइये। 
झूठ कुटुम्ब कुल काज, मती कोई रोइये ।। २ ।।
  विरह और प्रेम हृदय की सबसे गहरी अवस्थाएँ हैं। यदि तुझे 'विरह' (वियोग की पीड़ा) करनी ही है, तो उस 'सांई' (परमपिता परमात्मा) से मिलने के लिए कर और उसी के प्रेम में मोहित हो। यह संसार, कुटुम्ब (परिवार) और कुल—ये सब झूठे और स्वार्थ के रिश्ते हैं, जो केवल शरीर तक सीमित हैं। इसलिए इन नाशवान सांसारिक रिश्तों के मोह में फँसकर या इनके बिछड़ने पर अपने अनमोल आँसू मत बहा (मती कोई रोइये)। तेरे आँसू केवल परमात्मा के लिए गिरने चाहिए।
 
 दाव घाव सुण सोच, चिंता जो कीजिये। 
कर सायब सुं लेण मुगत गम लीजिये ।। ३ ।। 
  सांसारिक मनुष्य रात-दिन पैसा कमाने या शत्रुओं को हराने के लिए 'दाँव-पेंच' लगाता है और भविष्य की 'चिंता' व 'सोच-विचार' में डूबा रहता है। महाराज कहते हैं कि हे साधक! यदि तुझे चिंता या योजना (सोच) बनानी ही है, तो इस बात की चिंता कर कि उस साहिब (परमात्मा) से तेरा मिलन कैसे होगा। अपनी सारी बुद्धि और दाँव-पेंच उस 'मुक्ति के मार्ग' (मोक्ष की गम/ज्ञान) को खोजने और प्राप्त करने में लगा दे।
 
 जे कोई कमतर की चाय, भजन सो कीजिये। 
कह सुखदेव जुग काज, सेल में लीजिये ।। ४ ।। 
 यदि तेरे भीतर 'कमतर' (कमाल / श्रेष्ठता / कोई बड़ी उपलब्धि) प्राप्त करने की चाह (चाय) है, तो तू सत्य-नाम का अखंड 'भजन' कर, क्योंकि परमात्मा की प्राप्ति से बड़ी कोई दूसरी उपलब्धि इस ब्रह्मांड में नहीं है। अंत में संत सुखराम जी (सुखदेव जी) महाराज जीवन जीने का सबसे उत्तम सूत्र देते हुए फरमाते हैं कि अपनी पूरी शक्ति और तड़प परमात्मा के भजन में लगा, और जहाँ तक 'जुग काज' (संसार और गृहस्थी के दैनिक कार्यों) का सवाल है, उन्हें 'सेल' (सहज भाव से / बिना किसी मानसिक तनाव और आसक्ति के) निपटा लिया कर। संसार का कार्य केवल शरीर निर्वाह मात्र के लिए कर, उसे जीवन का मुख्य लक्ष्य मत बना।

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