भक्ति के मूलभूत नियम।अहंकार-शून्यता, जीवों पर दया, और सतगुरु व परमात्मा में अभेद दृष्टि (दोनों को एक मानना) ही वह नींव है, जिस पर मोक्ष का महल खड़ा होता है।
सब सुं निरसा होय, राम गुण गाइये।ज्युं तेरा रीजे श्याम, परमपद पाइये ।। १ ।।
हे जीव! संसार की सभी भौतिक इच्छाओं और आशाओं से मुक्त होकर (निरसा होय) तथा समाज में सबसे छोटा और नम्र (अकिंचन) बनकर उस परब्रह्म परमात्मा (राम) के गुणों का गान कर (अखंड सिमरन कर)। इस प्रकार की निष्काम और निरहंकार भक्ति से ही तेरा स्वामी (श्याम/परमात्मा) तुझ पर प्रसन्न (रीझेगा) होगा, और तभी तुझे आवागमन से मुक्त होकर उस 'परम पद' (केवल पद / आनंद पद) की प्राप्ति होगी।
अहूं पद में दुख होय, नरक में दीजिये।बिन शिवरण करतार, परथ नहीं रिजीये ।। २ ।।
यदि तूने 'अहं-पद' (अहंकार / मैं-पन) को धारण किया, तो वह तुझे केवल दुःख ही देगा और अंततः नरक की भयंकर यातनाओं में धकेल देगा। यह शाश्वत नियम है कि उस कर्ता-पुरुष (करतार/परमात्मा) के सत्य-नाम के सिमरन के बिना, वह परमात्मा किसी अन्य बाहरी कर्मकांड या दिखावे से कभी प्रसन्न (रिजीये) नहीं होता।
परमेश्वर कूं जांण, संता कूं मानिये।हरि गुरु बिच अंतराय, कबू नहीं आनिये ।। ३ ।।
सच्ची भक्ति का रहस्य यह है कि पूर्ण संतों (केवली भगवंतों) द्वारा बताई गई सत्य-विधि (सतशब्द के भेद) के अनुसार भजन करना ही 'परमेश्वर को जानना' और 'संतों को मानना' है। इसलिए अपने मन में 'हरि' (परमात्मा) और 'गुरु' (ब्रह्म-निष्ठ संत) के बीच कभी भी कोई 'अंतराय' (भेदभाव या अंतर) मत लाना। जो ज्ञान-स्वरूप गुरु हैं, वही साक्षात् परमात्मा हैं।
जीव दया दिल राख, धरम सो कीजिये।मत कर डावा डोल, राम रस पीजिये ।। ४ ।।
अपने हृदय में संसार के सभी जीवों के प्रति दया का भाव रख और यही तेरा सच्चा 'धर्म' है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए दान से देव ऋण, कर्तव्यों से पितृ ऋण, और भजन से ऋषि ऋण चुकाना ही सच्चा धर्म है। अपने मन को सांसारिक संकल्प-विकल्पों में 'डावाँडोल' (अस्थिर) मत होने दे। बस एकाग्रचित्त होकर भीतर गूँजने वाले अनहद नाद और सतशब्द रूपी 'राम-रस' (अमृत) का पान करता रह।
कसर कोर सब काड, भक्त सो कीजिये।तन मन धन सुखराम, गुरां कूं दीजिये ।। ५ ।।
अपने भीतर की सारी 'कसर-कोर' (कमियों, खोट और विकारों) को पूरी तरह निकाल दे और फिर निर्मल होकर उस पारब्रह्म की भक्ति कर।
अंत में संत सुखराम जी महाराज फरमाते हैं कि अपना "तन, मन और धन" सब कुछ अपने सतगुरु को समर्पित कर दे।
(यहाँ परमार्थिक दृष्टि से 'तन' का अर्थ है शरीर से निरंतर रटन करना, 'मन' का अर्थ है मन का अपनापन/अहंकार छोड़ देना, और 'धन' का अर्थ है अपनी आयु की एक-एक 'श्वास रूपी अनमोल पूँजी' को सतगुरु के बताए ज्ञान के अनुसार भजन में लगा देना। यही सच्चा समर्पण है।)
