Sunday, October 4, 2026

जीव बसे किस ठौड, निकस कहां जायगो।हरजस पद (१३)हरजस पद (१४)

 


संत सुखराम जी महाराज के साहित्य में यह 'प्रश्नोत्तरी' (Question-Answer) शैली अत्यंत अनूठी और तत्व-ज्ञान से परिपूर्ण है। यहाँ हरजस १३ में एक सच्चे जिज्ञासु (अथवा स्वयं साधक की अंतरात्मा) ने मोक्ष-मार्ग के सबसे गूढ़ और मूलभूत प्रश्न उठाए हैं। साथ ही यह चुनौती भी दी है कि जो गुरु इन प्रश्नों का सटीक उत्तर न दे सके, वह सच्चा सतगुरु नहीं हो सकता। इसके तुरंत बाद हरजस १४ में महाराज ने अपने पूर्ण अनुभव (अणभै ज्ञान) के आधार पर इन सभी रहस्यों का पर्दाफाश किया है।

          भाग १: हरजस पद (१३) - जिज्ञासु के परम प्रश्न

      (जीवात्मा का रहस्य)

जीव बसे किस ठौड, निकस कहां जायगो।

ओ तन छाड्या हंस, कहो काहा खायगो ।। १ ।।

 हे गुरुदेव! यह जीवात्मा (जीव) इस शरीर में किस स्थान (ठौर) पर निवास करती है? जब यह शरीर से निकलती है, तो कहाँ जाती है? और इस स्थूल शरीर को छोड़ने के बाद यह 'हंस' (आत्मा) वहाँ सूक्ष्म लोक में क्या खाता है (अर्थात् इसका पोषण कैसे होता है)?

               दूसरा पद (परमात्मा का रहस्य):

यांको अरथ विचार, भगत सो कीजिये।

शीव बसे किण जाग, भेद ओ दीजिये ।। २ ।।

 हे साधक! पहले इन बातों का अर्थ और विचार कर, फिर भक्ति में लग। हे गुरुदेव! मुझे यह गूढ़ भेद (रहस्य) बताइए कि वह परम 'शिव' (पारब्रह्म परमात्मा) इस शरीर में किस जगह (जाग) निवास करता है?

                               तीसरा पद       

           (सतशब्द का स्वरूप और सच्चे गुरु की कसौटी):

शब्द कोहो किण रूप, अरथ ओ कीजिये।

नितर करूं गुरु और, समझ गम लीजिये ।। ३ ।।

 मुझे यह समझाइए कि जिस 'सतशब्द' (निज नाम) की आप महिमा करते हैं, उसका 'रूप' (आकार/स्वरूप) कैसा है? एक सच्चे जिज्ञासु की भाँति वह कहता है कि मेरे इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दीजिए, 'नहीं तो मैं कोई और गुरु धारण कर लूँगा' (नितर करूं गुरु और)। अर्थात्, जो गुरु इन आध्यात्मिक रहस्यों का ज्ञाता न हो, उसकी शरण में जाने से मोक्ष नहीं मिल सकता।

              चौथा पद (सिमरन की विधि)

शिवरण को घर कोण, किसी राह ध्याइये।

कह सुखराम हरि नाम, निरख किम पाइये ।। ४ ।।

 परमात्मा के सिमरन (भजन) का असली 'घर' (आधार/स्थान) कौन सा है? और किस 'रास्ते' से उस परमात्मा का ध्यान करना चाहिए? संत सुखराम जी कहते हैं कि उस हरि के नाम को भीतर कैसे खोजकर (निरख) प्राप्त किया जा सकता है?

                   भाग २: हरजस पद (१४)   

                       सतगुरु द्वारा परम समाधान (उत्तर)

संत सुखराम जी महाराज ने इन सभी प्रश्नों के अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक (योग-सम्मत) उत्तर दिए हैं:

१. जीव का निवास, गमन और आहार (पहले प्रश्न का उत्तर):

जीव को कंठ स्थान है, निकस वासना जहां जावेगा। 

     ओ तन छोड़ जीव, कीयो फल खावसी ।।

निवास: जाग्रत अवस्था में इस जीवात्मा (जीव) का मुख्य निवास 'कंठ कमल' (गले के चक्र) में होता है (जहाँ से वाणी और संकल्प उठते हैं)।

गमन: मृत्यु के बाद यह जीव वहीं जाता है, जहाँ इसकी 'वासना' (इच्छाएँ और मोह) अटकी होती है। यदि धन में वासना है तो साँप बनेगा, परिवार में है तो उसी घर में पशु-पक्षी बनेगा। वासना ही इसकी अगली योनि तय करती है।

आहार: शरीर छोड़ने के बाद यह आत्मा स्थूल भोजन नहीं खाती, बल्कि जीवन भर जो इसने पाप-पुण्य रूपी कर्म किए हैं, यह उन्हीं कर्मों का 'फल खाती है' (अर्थात् स्वर्ग-नरक या चौरासी लाख योनियों का सुख-दुःख भोगती है)।

२. परमात्मा (शिव) का निवास (दूसरे प्रश्न का उत्तर):

शीव बसे सो जाग दशवों द्वार छे।

परमात्मा का स्थान:वह परम शिव (परमात्मा/कैवल्य सत्ता) इस शरीर के भीतर सबसे ऊँचे शिखर अर्थात् 'दशम द्वार' (ब्रह्मरंध्र / भृकुटी के ऊपर गगन मंडल) में निवास करता है। जब सुरति नौ द्वारों (आँख, कान, नाक आदि) को छोड़कर दसवें द्वार में प्रवेश करती है, तभी उस परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

३. सतशब्द का स्वरूप (तीसरे प्रश्न का उत्तर):

शबद सो रूप, पोप वास जैसो है।।

शब्द का स्वरूप: यह योग-साधना का सबसे सुंदर रूपक है। महाराज कहते हैं कि उस 'सतशब्द' (निज नाम) का स्वरूप वैसा ही है जैसे किसी फूल (पोप/पुष्प) में बसी हुई सुगंध (वास)। जिस प्रकार फूल की सुगंध को देखा या पकड़ा नहीं जा सकता, उसका कोई रंग-रूप नहीं होता, परंतु उसे 'महसूस' (अनुभव) अवश्य किया जा सकता है; ठीक उसी प्रकार 'सतशब्द' निर्गुण और निराकार है, परंतु जब भीतर अनहद नाद प्रकट होता है, तो उसका स्पष्ट अनुभव और आनंद साधक को प्राप्त होता है।

४. सिमरन का घर और मार्ग (चौथे प्रश्न का उत्तर):

शिवरण को घर प्रेम, पवन की राहा ध्याइये।  

      भजन कर नांव उलटे सुरत मन आ फेहेर पावसी।

सिमरन का घर: सिमरन का सच्चा घर (स्थान) कोई मंदिर, मस्जिद या बाहरी आसन नहीं है, बल्कि हृदय का 'सच्चा प्रेम' है। जहाँ असीम प्रेम और विरह है, वहीं सच्चा सिमरन टिकता है।

ध्यान का मार्ग: ध्यान किस रास्ते से करें? महाराज बताते हैं कि 'पवन की राह' (श्वास-उच्छ्वास के मार्ग) से ध्यान करो। आती-जाती श्वास के साथ नाम (सतशब्द) को जोड़ दो।

प्राप्ति कैसे हो: जब साधक श्वास-उच्छ्वास से नाम का भजन करता है, तो संसार की ओर भागने वाले उसके 'मन' और 'सुरति' (चेतना) वहाँ से उलट (रिवर्स होकर) जाते हैं और भीतर गगन मंडल की ओर चढ़ने लगते हैं। इसी उल्टी चाल  उस पारब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति होती है।

सार:

यह दोनों हरजस मिलकर  पूरा का पूरा शास्त्र (Manual) बन जाते हैं। इनमें बताया गया है कि वासनाओं से मुक्त होकर, प्रेम को आधार बनाकर, श्वासों के मार्ग से अपनी चेतना को उलटकर दशम द्वार तक ले जाना ही जीव का अपने शिव (परमात्मा) से मिलने का एकमात्र मार्ग है।

जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था?सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं

हरजस पद राग मिश्रीत (५)   संत सुखराम जी महाराज का यह हरजस अत्यंत तार्किक, दार्शनिक और सुरति-शब्द योग के सबसे बड़े रहस्य का उद्घाटन करने व...