Wednesday, September 3, 2025

Banda yun jug mohe na jaane बांदा यूं जग मोहे न जाणे_ हरजस पद राग शब्द (४)






बांदा यूं जग मोहे न जाणे।
अगम देश का मैं उपदेशी, ओ मायारस माणे ॥ टेर ॥ 

भाग बिना ज्यूं चीज न पावे, गुण बिन बुज न जाणे।

 ईऊं जड़ी जंगल में बहू तेरी, कोई नहीं पिछाणे ॥ १ ॥ 


ये सब मेरी काया देखे, आत्म की चल भाई।

 ऐसी खबर किसी कूं नांही, बिछड़ रहत है नांही ॥ २ ॥ 


कह सुखराम पिछाणे मोने, तामें निज पद जागे।

 ऊलटर हंस चढे गढ ऊपर, ध्यान समाधि लागे ॥ ३ ॥ 


Banda yun jug mohe na jaane.

Agam desh ka main updeshi, o mayaaras maane. ॥ Ter ॥

Bhag bina jyun cheez na paave, gun bin buj na jaane.
Eun jadi jangal mein bahu teri, koi nahi pichhaane. ॥ 1 ॥
Ye sab meri kaaya dekhe, aatma ki chal bhai.
Aisi khabar kisi ko naahi, bichhad rahat hai naahi. ॥ 2 ॥
Kah Sukhram pichhaane mone, tamein nij pad jaage.
Ulatar hans chadhe gadh upar, dhyaan samadhi laage. ॥ 3 ॥

मन से महाराज फरमाते हैं — यह संसार मुझे नहीं जानता है। मैं अगम देश — अर्थात केः पद और आः पद का उपदेश करता हूँ। परन्तु यह संसार माया, यानी तीनों लोकों के सुख को चाहता है।भाग्य बिना कोई वस्तु प्राप्त नहीं होती। अगर किसी वस्तु के गुण नहीं जानते, तो उसे नहीं लिया जाता। इसी प्रकार, संसार में बहुत-सी जड़ियाँ (औषधियाँ) हैं, परंतु लोग उनकी पहचान नहीं कर पाते।सभी आत्माएँ केवल उस शरीर को देखती हैं जिसे उन्होंने धारण किया है। पर यह शरीर तो नाशवान है, इसकी किसी को सही खबर नहीं है।महाराज फरमाते हैं — जो मुझे पहचानते हैं, यानी मेरा ज्ञान धारण करते हैं,

 उन्हें निज पद, अर्थात केः पद और आः पद की प्राप्ति होती है।जब साधक बंकनाल से उलटकर गढ़ (ऊर्ध्वगमन) की ओर चढ़ता है, तो उसे केः पद और आः पद की प्राप्ति होती है, और उसमें ध्यान-समाधि, यानी सता समाधि लग जाती है।






Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...