बिन धवण लोहा जे गाले, बिन पोयां व्हे रोटी। तो आ मुक्त सैन सुं होवे, बिन बाढा व्हे छोटी ।। १ ।।
कुवो खिणयां बिन जल काढे, बिन झाडा फल तोडे। तो आ मुक्त सैन सुं होवे, फोज लडियां बिन मोडे ।। २ ।।
काडे कील बीच में बेहता, तो धोरे बेल न आवे। कह सुखराम काज नहीं सरसी, ऊलट रसातल जावे ।। ३ ।।
Bin dhavan loha je gaale, bin poyaan whe roti.
To aa mukt sain soon hove, bin baadha whe chhoti. ॥1॥
Kuvo khinyaa bin jal kaadhe, bin jhaada phal tode.
To aa mukt sain soon hove, fauj ladiyaan bin mode. ॥2॥
Kaade keel beech mein baheta, to dhore bel na aave.
Kah Sukhram kaaj nahi sarsi, oolṭ rasaatal jaave. ॥3॥
बिना धवण के लोहा गल जाता हो, और बिना पोए रोटी हो जाती हो, और वन को काटे बिना छोटा हो जाताहो, तो यह मुक्ति सैन से हो सकती है। कुएं को खोदे बिना जल निकल जाता हो, बिना वृक्ष के ही फल तोड़ सकते हो और बिना लड़े कोई फौज मोड़ सकते हो, तो यह मुक्ति सैन से हो सकती है। बहते चड़स के बीच में से कील निकाल दें, तो बैल धोरे में नहीं आता। महाराज फरमाते हैं कि संज, सूत, चड़स सब कुएं में पड़ जाते हैं। यही रसातल जाना है, पानी नहीं आना ही काज नहीं सरना है।