धिन गुरु ज्ञान जो साध इण जुग में, अनन्त ही जीव कूं आंण तारे।
मेरे है ऊर मन र मन ओसी आवे, जुगन जुगन रहूं लारे ॥ टेर।
भरम तो बोहोत जंजाल बोहो घट में, जुगत के संग मा जाऊं बुओ।
कृपाल दयाल मुझ आंण काढियो, भव ही सिंध से कियो जुवो ॥ १ ॥
ज्ञान तत्काल मुझ आंण असो दियो, अरध ही नांव को भेव आंणी।
जीव उत्पत ओ आद गुण ऊपना, तीन तिरलोक शिर गत जांणी ॥ २ ॥
काल का मुख सुं आंण मुझ काढियो, गरभ ही जूण की भरान्त खोई।
केत सुखदेव भू स्वर्ग पाताल में, नाम गुरुदेव सम नांय कोई ॥ ३ ॥
Harjas Pad Raag Charchari (1)
Dhin Guru gyaan jo saadh in jug mein, anant hi jeev koon aan taare.
Mere hai oor man r man osi aave, jugan jugan rahun laare. (Ter)
Bharam to bohot janjal boho ghat mein, jugat ke sang ma jaaun buo.
Kripal dayal mujh aan kaadhiyo, bhav hi sindh se kiyo juvo. ॥1॥
Gyaan tatkaal mujh aan aso diyo, ardh hi naam ko bhev aannee.
Jeev utpat o aad gun oopna, teen tirlok shir gat jaani. ॥2॥
Kaal ka mukh soon aan mujh kaadhiyo, garbh hi joon ki bharaant khoi.
Ket Sukhram bho swarg paatal mein, naam Gurudev sam naany koi. ॥3॥
❖ सतगुरु और अणभव ज्ञान की महिमा ❖
ऐसे सतगुरु, अर्थात् केवल रूप भगवंतों को, और उनके अणभै (अणभव — इन्द्रियों से परे) ज्ञान को तथा उन महान संतों को धन्य कहा गया है — जिनके ज्ञान और कृपा से अनगिनत जीवों का उद्धार हुआ है।मेरे मन में यह भावना उठती है कि — मैं युगों-युगों तक सतगुरु के अणभै ज्ञान को ही धारण करूं, उसी में स्थिर रहूं।इस शरीर में रहकर, कर्म और भ्रम रूपी जंजालों में उलझे रहना ही इस जगत के संग बहने के समान है — अर्थात् माया में फँसना।लेकिन दयालु और कृपालु सतगुरु ने मुझे अरध शब्द — यानी ररंकार का गूढ़ भेद प्रदान किया, जिससे यह समझ में आया कि जीव की उत्पत्ति आदि से तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में होती आई है।परन्तु सतगुरु ने मुझे उस मूल कारण से अलग कर दिया — और मुझे नाम (निज नाम) में स्थिर कर दिया।अब — जन्म-मरण और गर्भ में बार-बार आना, चौरासी लाख योनियों का भोगना — सब भ्रांतियाँ मिट गई हैं। महाराज फरमाते हैं: तीनों लोक — स्वर्ग, मृत्यु लोक और पाताल में
निज नाम और सतगुरु, अर्थात् केवली भगवंतों के समान कोई नहीं है।