संतो अगम गेल गत न्यारी। ज्यां जांणी ज्यां ब्रह्म तज्यो, तजी राम पियारी ॥ टेर ॥
ने करमी ने नहीं पिछाणे, जब लग जोगी नांही। ज्ञान ध्यान की लगी समाधि, है तो जुग के मांही ॥ १ ॥
कास मेर लग करे कासटा, काया कसणी भारी। मन चावे सो कर बतावे, है पको संसारी ॥ २॥
सुण अवतार अलख सो बाजे, पारब्रह्म के कोई। अखर ब्रह्म तजो जोत सरूपी, जगत शब्द है दोई ॥ ३ ॥
ओ बैराग जगत नहीं बाजे, राजा बादशाह नहीं होई। कह सुखराम ना है निरख वालो, लखसी बिरला कोई ॥ ४ ॥
Harjas Pad Raag Hori (3)
Santo agam gel gat nyaari. Jyaan jaani jyaan Brahm tajo, taji Ram piyaari. (Ter)
Ne karmi ne nahi pichaane, jab lag jogi naahi.
Gyaan dhyaan ki lagi samadhi, hai to jug ke maahi. ॥1॥
Kaas mer lag kare kaasta, kaaya kasni bhaari.
Man chaave so kar bataave, hai poko sansaari. ॥2॥
Sun avatar alakh soon baaje, Parbrahm ke koi.
Akhar Brahm tajo jot sarupi, jagat shabd hai doi. ॥3॥
O bairag jagat nahi baaje, raja badshaah nahi hoi.
Kah Sukhram na hai nirkh vaalo, lakshi birla koi. ॥4॥
केवल पद की प्राप्ति और सच्चा साधन
संतों से महाराज फरमाते हैं: केवल पद की प्राप्ति का साधन सब साधनों से अलग होता है। जिन्होंने केवल पद या आनंद पद की प्राप्ति की है, वे ही माया और ब्रह्म के पद से अलग हुए हैं। यही ब्रह्म और राम प्यारी (माया-मोह) का तजना है।नैकरमी का पद — अर्थात केः पद —
उसका अनुभव वे नहीं कर पाते जो अभी तक कर्मों के फेर में हैं। जब तक जीव शुभ-अशुभ करणियों से मुक्त नहीं होता, तब तक वह सच्चा योगी नहीं कहलाता।मन से जो ज्ञान धारण करते हैं, उन्हें ज्ञान की समाधि तो लगती है, लेकिन वह अभी भी तीन लोक के भीतर ही सीमित है — यानी जगत में ही स्थित साधना है।शरीर को बहुत कष्ट देकर, विभिन्न प्रकार के कठोर अभ्यास करना — यही काया कसनी कहलाती है।मन में जो इच्छाएँ उठती हैं, उन्हीं के अनुसार चमत्कार दिखा देते हैं — इसे ही परचा देना कहते हैं। लेकिन ये सब बातें संसार के भीतर की ही हैं।कोई अवतारों को अलख (अदृश्य) बताता है, तो कोई पारब्रह्म बताता है।अक्षर ब्रह्म का ज्ञान — जो आत्मचेतना के आधार पर चलता है — उसे भी छोड़ देना चाहिए।श्वांस के आधार पर जो शब्द हैं, जैसे ओऊं और सोऊं — वे जगत में ही फल देने वाले हैं।
लेकिन जो जगत में ही स्थित है, वह वैरागी नहीं हो सकता — जैसे राजा, बादशाह नहीं हो सकता।महाराज फरमाते हैं: केवल पद और आनंद पद की प्राप्ति का अणभै ज्ञान धारण करने वाले बिरले ही होते हैं।
संतो से महाराज फरमाते हैं कि केवल पद की प्राप्ति का साधन सबसे अलग है। जिन्होंने केवल पद आनंद पद की प्राप्ति की है वो ही माया व ब्रह्म के पद से अलग हुये है। यही ब्रह्म व राम प्यारी का तजना है। ने करमी का पद केः पद है उसका अनुभव नहीं करते है। तब तक जोगी याने करमो से शुभ अशुभ करणियो से अलग नहीं है। मन से ज्ञान धारण करते है, ज्ञान की समाधि लगती है, वो जगत में ही है याने तीन लोको में रहने का ही साधन है। शरीर को बहुत कष्ट देकर कई तरह के बहुत साधन करना ही काया कसणी भारी है, इस मन में जो इच्छा होती है वो ही करके बता देते है, याने परचा देते है। यह सब बाते संसार की है। सुणो अवतारो को कोई अलख बताता है और कोई पारब्रह्म बताते है। अक्षर ब्रह्म का ज्ञान जो आत्म चेतन के आधार पर रहता है। वो भी छोडो। श्वांसा के आधार के जो शब्द है। ओऊं सोऊं है वो जगत में ही फल देने वाले है। जगत में रहने वाला बैरागी नहीं होता है, जैसे राजा बादशाह नहीं हो सकता है। महाराज फरमाते हैं कि केवल पद आनंद पद की प्राप्ति का अणभै ज्ञान धारण करने वाले बिरले ही है।