सुन्न में खेलुं सायब संग होरी। और शकल ही से तोडी, मैं तो एक रमैया सूं जोडी ॥ टेर ॥
सब सखियां मिल ओ अरथ बांध्यो, भली ही बात आ हो री ॥ वा पुल पोर घडी दिन धिन्न है, हम हर बेली जोरी ॥ १
पांच पचीस मिली सब संईयां, उलट शब्द लहोरी। सुर नर देव घाट सब लांग्या, बैण ब्रह्म सूं कहोरी ॥ २ ॥
त्रिकुटी शहर जहां हर समरत है, जां जाय हेला दो री। हरि रंग राग बिलास करिजे, आनन्द सुख तुम लहोरी॥ ३ ॥
खेलो जाय पिया संग गढ़ में, बिच पडदा मति दो री। कह सुखराम हरि सूं हिलमिल, लोत पोत होय रहोरी ॥ ४ ॥
Harjas Pad Raag Hori (2)
Sunn mein khelu Saayab sang Hori. Aur shakal hi se todi, main to ek ramaiya soon jodi. (Ter)
Sab sakhiyaan mil o arath baandhyo, bhali hi baat aa ho ri.
Va pul por ghadi din dhinn hai, ham har beli jori. ॥1॥
Paanch pachees mili sab saaiyaan, ulat shabd Lahori.
Sur nar dev ghaat sab langya, bain Brahm soon kahori. ॥2॥
Trikuti shahar jahan har samrat hai, jaan jaay hela do ri.
Hari rang raag bilaas karije, anand sukh tum Lahori. ॥3॥
Khelo jaay piya sang gadh mein, bich paddaa mati do ri.
Kah Sukhram Hari soon hilmil, lot pot hoy rahori. ॥4॥
सतशब्द की होरी — आत्मा की दिव्य लीला
सुन्न, अर्थात निरंजण निराकार पद में सतशब्द का अनुभव होना ही साहिब के साथ होरी खेलना है। और जब आत्मा सबसे अलग होकर केवल सतशब्द में जुड़ती है — तो यही रामजी से जोड़ना और सबसे तोड़ना है।सभी ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर यह विचार करती हैं कि — यह होरी, अर्थात आत्मिक ज्ञान, अत्यंत श्रेष्ठ है। धन्य है वह समय, वह घड़ी, वह दिन — जब सूरत, अर्थात आत्मचेतना, हर क्षण सतशब्द का अनुभव करती है। यह है हर बेली जोरी — हर पल परमात्मा से जुड़ना।पाँच तत्व और पच्चीस प्रकृतियाँ — इनको शरीर में उलटकर जब आत्मा सतशब्द का अनुभव करती है, तो यही उलट शब्द लहोरी कहलाता है।सुर, नर, देव — इनके जितने भी स्थान हैं, उन सबको पार कर, जब आत्मा सतशब्द का अखण्ड अनुभव करती है, तो यही बेंण ब्रह्म सूं कहोरी है।त्रिकुटी में जब शब्द का अनुभव होता है, तो यही है — जां जाय हेला दो री।शब्द का अनुभव कर जब आनंद उत्पन्न होता है, तो यही हरि रंग, राग, विलास है — अर्थात आनंद और प्रेम का अद्भुत रस। यही सच्चा सुख है।जब आत्मा ब्रह्मांड और पारब्रह्म को पार कर केवल पद में सतशब्द का अनुभव करती है, तो वही साहिब के साथ साक्षात होरी खेलना है — जहाँ कोई परदा नहीं रहता, न द्वैत।महाराज फरमाते हैं: "आनंद पद में लय हो जाना ही 'लोत-पोत' होना है" — अर्थात आत्मा का पूर्ण विलय, परम आनंद में होना।
सुन्न याने निरंजण निराकार पद में सतशब्द का अनुभव होना ही सायब के साथ होरी खेलना है और सबसे अलग होकर सतशब्द का अनुभव करना ही रामजी से जोडना व सबसे तोडना है। सब ज्ञानेन्द्रिया मिलकर यह विचार करती है कि यह होरी याने ज्ञान बडा श्रेष्ठ है और वो समय वो घडी वो दिन धिन है जिसके सूरत याने आत्मचेतन हर समय सतशब्द का अनुभव करती है। यह हर बेली जोरी है। पांच तत्व पचीस प्रकृतियों का शरीर में उलट कर सतशब्द का अनुभव करना ही उलट शब्द लहोरी है। सुर, नर, देव के जितने भी स्थान है उनको पार करके सतशब्द का अखण्ड अनुभव करना ही बेण ब्रह्म सूं कहोरी है। त्रिकुटी में शब्द का अनुभव होना ही जां जाय हेला दो री है। शब्द का अनुभव कर आनन्द आना ही हरि रंग राग बिलास करना है व आनन्द सुख लेना है। ब्रह्मण्ड पार ब्रह्म से ऊपर केवल पद में सतशब्द का अनुभव करना ही उसके साथ खेलना व बीच परदा नहीं देना है। महाराज फरमाते हैं कि आनन्द पद में लय होना ही लोत पोत होना है।