संईया खेलो फाग होरी आई। आज आछी पुल पाई, आ तो रूत बसन्त चल जाई ॥ टेर ॥
अवगत देव निरंजन सुन्न में, , ज्यां संग खेलो जाई। अनन्त कोट साधु जन खेले, नाद घुरे एक गाई ॥ १ ॥
शील संतोष सांच लिया, मनवो भजे है निरंजन राई।अंतर मांय अखण्ड धुन लागी, गिगन मंडल घर मांही ॥ २ ॥
सांस उसांस पिचरका छूटे, ज्ञान गुलाल उडाई। निज कण नीर नांव ले मिलिया, आठ पहर एक सांई ॥ ३
सब तन खोज अगम घर पहुंता, आद हमारे मांही। जन सुखराम मगन रम हुवा, राम मिल्या हर आई ॥ ४ ॥ ॥
Harjas Pad Raag Hori (1)
Sainya khelo Fag Hori aai. Aaj aachi pul paai, aa to root basant chal jaai. (Ter)
Avagat Dev Niranjan sunn mein, jyaan sang khelo jaai.
Anant kot sadhu jan khele, naad ghure ek gaai. ॥1॥
Sheel santosh saanch liya, manvo bhaje hai Niranjan raai.
Antar maay akhand dhun lagi, gigan mandal ghar maahi. ॥2॥
Saanas usans picharka chhoote, gyaan gulaal udaai.
Nij kan neer naam le miliya, aath pahar ek Saai. ॥3॥
Sab tan khoj agam ghar pahunta, aad hamare maahi.
Jan Sukhram magan ram huwa, Ram milya har aai. ॥4॥
फाग खेल और आत्मा की पुकार
आत्मा सभी इन्द्रियों से कहती है — “सतगुरु की विधि से भजन में लगो, यही फाग का आना और होरी खेलना है।”यह मनुष्य शरीर मिला है, यही नया है, यही अच्छी पुल आई (अवसर की घड़ी आई)। मनुष्य शरीर पाकर भी यदि भजन नहीं किया, तो यही बसंत ऋतु का चला जाना है — अर्थात अवसर खो देना है।पारब्रह्म परमात्मा के निरंजण निराकार पद में सतशब्द का अनुभव हो रहा है — यही उसके साथ होली खेलना है।अनंत कोटि संतों ने उस पद की प्राप्ति की है। शब्द की धुनी का अनुभव होना ही नाद का घुरना (गूंजना) है।शील, सांच (सत्य), संतोष, और विश्वास के साथ मन लगाकर सांस-उसांस में भजन करना ही निरंजन राय को भजना है।ब्रह्मांड और पारब्रह्म से ऊपर
गगन मंडल में सतशब्द की धुनी का अखंड अनुभव होना ही अंतर में धुन लगना है।सांस-उसांस में भजन करना ही पिचरका छोड़ना है।
ज्ञान करना ही गुलाल उड़ाना है।निज नाम — कण के समान, और नाम — जल के समान है। उसका रात-दिन भजन करना ही एक साईं, अर्थात परमात्मा की भक्ति करना है।सब शरीरों को साधकर केवल पद की प्राप्ति करना ही अगम घर पहुंचना है। इसका अनुभव अंदर में होता है — यही आदि हमारे माहिं है।महाराज फरमाते हैं: "उस पद की प्राप्ति होने से ही आनंद प्रकट हो रहा है — रामजी शरीर में मिल गए हैं। यही राम मिल्या हर आई (राम का मिलना ही हरि का आना) है।"
आत्मा सब ईन्द्रियों से कहती है कि सतगुरु विधि से भजन करने में लगो, यही फाग का आना व होरी खेलना है। यह मनुष्य शरीर मिला है यही ना है यही अच्छी पुल आई। मनुष्य शरीर पाकर भजन नहीं करना ही बसन्त ऋतु का जाना है। पारब्रह्म परमात्मा का निरंजण निराकार पद में सतशब्द का अनुभव हो रहा है यही उसके साथ खेलना है। अनन्त कोट संतो ने उस पद की प्राप्ति की है। शब्द की धुनी का अनुभव होना ही नाद का घुरना है। शील सांच सन्तोष व विश्वास के साथ मन लगाकर सांस उसांस में भजन करना ही निरंजन राय को भजना है। ब्रह्मण्ड से पारब्रह्म से ऊपर गिगन मण्डल में सतशब्द की धुनी का अखण्ड अनुभव होना ही अन्तर में धुन लगना है। सांस ऊसांस में भजन करना ही पिचरका छोडना है। ज्ञान करना ही गुलाल उडाना है। निज नांव कण और नांव पानी की तरह है। उसका रात दिन भजन करना ही एक सांई याने परमात्मा की भक्ति करना है। सब शरीर सोधकर के पद की प्राप्ति करना ही अगम घर पहुंचना है। है। इसका अनुभव अन्दर में होता है, यही आद हमारे मांही है। महाराज फरमाते हैं कि उस पद की प्राप्ति होने से आनन्द हो रहा हा है। रामजी शरीर में मिल गये है। यही राम मिल्या हर आई है।