सब विध सारण काम, पिया मुज दरशण दिजे हो। ओगण गारी रा पीव, पिया मुज दरशण दिजे हो । टेर ॥
ऋतुवंती ऋतु ऊपरे प्रभु, व्याकुल भयो शरीर। बेगा बेग पधारजो प्रभु, आत्म धरे न धीर ॥ १ ॥
जल बिल नागर बेलडी प्रभु, पोप फूल कुमलाय । तुम बिन आत्म सुन्दरी प्रभु, यूं दुख अन्तर मांय ॥ २ ॥
जल खुटा सर सुखीया हो, दादर दुख अपार । मीन दुखी जल बायरी प्रभु, तुम बिना आत्म नार ॥३॥
पपियो पिव पिव करे, प्रभु चंदर दिष्ट चकोर । जन सुखिया यूं आत्मा रे, लगी ब्रह्म सूं डोर ॥ ४॥
Harjas Pad Raag Gund (5)
Sab vidh saaran kaam, piya muj darshan dije ho.
Ogan gaari ra peev, piya muj darshan dije ho. (Ter)
Rituwanti ritu oopare Prabhu, vyaakul bhayo sharir.
Bega beg padhaaro Prabhu, aatm dhare na dheer. ॥1॥
Jal bil nagar beldi Prabhu, pop phool kumlaay.
Tum bin aatm sundari Prabhu, yoon dukh antar maay. ॥2॥
Jal khuta sar sukhiya ho, dadar dukh apaar.
Meen dukhi jal baayri Prabhu, tum bina aatm naar. ॥3॥
Papiyo piv piv kare, Prabhu chandar disht chakor.
Jan sukhia yoon aatma re, lagi Brahm soon dor. ॥4॥
सब विधियों से कार्य सवारने वाले परमात्मा! कृपा करके मुझे दर्शन दीजिए। मैं तो अवगुणों की भण्डार हूं, फिर भी आपकी कृपा की आशा करती हूं। हे दाता! मुझे दर्शन दीजिए।जैसे ऋतुवंती स्त्री ऋतु आने पर अपने पति से मिलने को व्याकुल होती है, वैसे ही आत्मा का मनुष्य जन्म में आना — मानो ऋतु का आना है।क्योंकि परमात्मा की प्राप्ति केवल मनुष्य जन्म में ही होती है, इसलिए आत्मा रात-दिन तड़पती रहती है, और आपसे प्रार्थना करती है — "हे प्रभु! जल्दी से जल्दी सता रूप में पधार कर दर्शन दीजिए।" यही 'बेगा-बेग पधारना' और 'धरे न धीर' की स्थिति है।जैसे जल के बिना नागरबेल और फूल कुम्हला जाते हैं, वैसे ही आपके बिना आत्मा अंतर में बहुत दुखी है। सरोवर का जल सूखने पर मेंढक तो दुखी होता है, लेकिन मछली तो जल के बिना जीवित ही नहीं रह सकती। ऐसे ही आत्मा, आपके दर्शन बिना एक पल भी नहीं रह सकती।मैं पपीहे की भांति ‘पीव-पीव’ कर रही हूं स्वाति नक्षत्र की बूंद की प्रतीक्षा में। मैं चकोर की तरह केवल चंद्रमा की ओर निहारती हूं।महाराज फरमाते हैं: ऐसी आत्मा से जब अखण्ड भजन और अखण्ड ध्यान होता है, तो वही ब्रह्म से डोर लगना है।
सब विधि से कार्य सारने वाले परमात्मा आप मुझे दर्शन दीजिये, मैं तो अवगुणो की भण्डार हूं तो भी कृपा करे, मुझे दर्शन दीजिये। ऋतुवंती स्त्री ऋतु आने पर पति से मिलने के लिये व्याकुल होती है ऐसे आत्मा का मनुष्य जन्म में आना ही ऋतु आना है। परमात्मा की प्राप्ति मनुष्य जन्म में ही होती है। इसलिये आत्मा परमात्मा की प्राप्ति के लिये रात दिन तडफती रहती है, और परमात्मा से प्रार्थना करती है कि आप जल्दी से जल्दी सता रूप में पधार कर दर्शन दो। यही बेगा बेग पधारना व धरे न धीर है। जैसे जल के बिना नागर बेल व पुष्प कुमलाते है ऐसे ही आपके बिना आत्मा अन्तर में बहुत दुखी है। सरवर का जल खत्म होने पर मेंढ़क दुखी होता है। लेकिन मछली जल के बिना रह नहीं सकती। ऐसे ही आपके दर्शनो के बिना आत्मा नहीं रह सकती। मैं पपिया स्वाती नक्षत्र की बून्द के लिये पीव पीव करता है, चकोर पक्षी चन्द्रमा की तरफ ही देखता रहता है। महाराज फरमाते हैं कि ऐसे आत्मा से अखण्ड भजन व अखण्ड ध्यान होना ही ब्रह्म से डोर लगना है।