हाथी है झूठो है झूठो, कोई फेरे संत अफूटो, हाथी है झूठो है झूठो ।। टेर ।।
मोरो बंदे न आंकस माने, शांकल गिणे न खूंटो। ब्रह्मा विष्णु महेश्वर खसिया, नेकन फिरयो अपूटो।
खट सो जती दत्त की मईयां, उण संई कियो चपेटो। रिषियां मुनिया घेर घेर राख्यो, तोही रह गयो छूटो ।। २ ।।
त्यागी तपी सूरवां ऊपर, कोप करे कर टूटो। जुग तो शकल देखतां भागो, अड बड बासन फूटो ।। ३ ।।
ऊलटा होय गिगन में चढिया, ज्यां काटो कर पीटो। जन सुखराम समाधी पूंता, ज्यां हां पल भर खूटो ।। ४ ।।
Harjas Pad Raag Jet Shri (2)
Haathi hai jhootho hai jhootho, koi fere Sant Aphooto, haathi hai jhootho hai jhootho. (Ter)
Moro bande na aankas maane, shaankal gine na khoonto.
Brahma Vishnu Maheshwar khasiya, nekan phiryo aaphooto. ॥1॥
Khat so jati datt ki maiyya, un saeen kiyo chhapeto.
Rishiya muniya gher gher raakhyo, tohi rah gayo chhooto. ॥2॥
Tyagi tapi soorawan oopar, kop kare kar tooto.
Jug to shakal dekhata bhaago, ad bad baasan phooto. ॥3॥
Oolta hoy gigan mein chadhiya, jyaan kaato kar peeto.
Jan Sukhram samadhi poonta, jyaan haan pal bhar khooto. ॥4॥
महाराज फ़रमाते हैं कि यह मन रूपी हाथी झूठा है। इसको तो संतों के ब्रह्म ज्ञान द्वारा ही फेरा जा सकता है। अन्य साधनों से यह झूठा मन नहीं फिरता है। शास्त्रों के ज्ञान से, तीनों लोकों की मर्यादा से और नरक में जाने से भी यह मन नहीं डरता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव की सेवा-पूजा करने से भी नहीं फिरता है। छह जती हुए, दत्तात्रेय जी की माता अनसूया, उन्हें भी चपेटा लग गया। इस मन को ऋषि-मुनि तपस्या करके वश में करना चाहा, तो भी नहीं हुआ। कई त्यागी, तपस्वी, शूरवीर हुए, वे भी मन को वश में नहीं कर सके, तो जगत की तो क्या कहें, यह तो आपस में ही विचारों से लड़-भिड़ रहे हैं। जिन्होंने संतों का सतज्ञान धारण करके गगन में चढ़ गए, फिर उनके मन को काटो या पीटो, अर्थात मन निजमन हो जाता है। महाराज फ़रमाते हैं कि फिर वह भक्ति करने वाला समाधि देश में पहुँचता है, जिसके मन के विचार स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं।"