ओ तेरे क्या न्याव है, सुण लिज्यो सांई। नुगरा नर राजस करे, जन भीखण जाई ।। टेर ।।
जन दुखिया तो ही भला, मेरी भक्त कमावे। अमरापुर ले जावसु, जुग जुग सुख पावे ।। १ ।।
जन कुं माया राज दूं, तो सब ही मुज माने। नरक कुंड खाली रेह, जुग में कुण जामें ।। २ ।।
देऊं तो लेवे नहीं, मेरा जन माया। ज्यां सुख जाण्या पीव का, ज्यां ने और न भाया ।। ३ ।।
माया भक्ति ओगटी, भेली नहीं रेहे। इण कारण सुखराम कह, जन कूं दुख देहे ।। ४ ।।
Harjas Pad Raag Bilawal (13)
O tere kya nyaav hai, sun lijyo saaiyaan. Nugra nar raajas kare, jan bheekhan jaai. (Ter)
Jan dukhiya to hi bhala, meri bhakt kamaave.
Amarapur le jaavasu, jug jug sukh paave. ॥1॥
Jan kun maaya raaj doon, to sab hi muj maane.
Narak kund khaali reh, jug mein kun jaame. ॥2॥
Deoon to leve nahi, mera jan maaya.
Jyaan sukh jannya peev ka, jyaan ne aur na bhaaya. ॥3॥
Maaya bhakti ogati, bheli nahi rehe.
In kaaran Sukhram kah, jan kun dukh dehe. ॥4॥
"हे परमात्मा, आपके यहाँ यह कैसा न्याय है कि जो भक्ति नहीं करते, वे माया के सुख भोगते हैं, और जो जन, यानी भक्ति करने वाले हैं, वे माँगने जाते हैं? महाराज फ़रमाते हैं कि भक्ति करने वालों का दुख ही अच्छा है, क्योंकि दुख में ही परमात्मा की भक्ति करने से अमरलोक की प्राप्ति होती है, जिससे युगों-युगों तक सुख मिलता है। यदि मैं जनों को माया, राज, करामात, करतूत और सिद्धि की प्राप्ति करा दूँ, तो सभी मुझे मानने लग जाएँगे, जिससे नरकों में कोई नहीं जाएगा और जगत में कोई जन्म नहीं लेगा। मैं अपने जनों को माया देता भी हूँ, तो भी वे नहीं लेते, क्योंकि जिसने परमात्मा की भक्ति का आनंद प्राप्त किया है, उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। माया और भक्ति साथ-साथ नहीं रहती हैं। इसलिए जनों को माया की प्राप्ति नहीं होती, यही दुख देना है।"