साधो हमने सतगुरू मोरथ दिया। अष्ट सिद्ध नव निद्ध मुक्त मिली रे, सब सिद्ध कारज किया ।। टेर ।।
दिशा शूल सांसो सब टाल्यो, जिकर जोगणी लारा। सनमुख चंद सुधा रस पियो, इस विध कारज सारा ।। १ ।।
कंटक जोग जुध सब ही टाल्यो, लिव धम पुला बोहो सधाई। अडद ऊडद को दियो दुगडियो, पिछम गेल हम पाई ।। २ ।।
सिद्ध जोग भेद पकडायो, सांसा काल हम पाल्या। दिन काल कलेश सब मेटर, पिछम दिशा ने चाल्या ।। ३ ।।
ईमरत जोग द्वादस आगल, ज्यां हम सूरत लगाई। कह सुखराम ऊलट चढ गढ में, पीव परसीया मांई ।।४।।
harajas pad raag kalyaaṇ (५)
saadho hamane sataguruu morath diyaa. ashṭ siddh nav niddh mukt milii re, sab siddh kaaraj kiyaa .. ṭer ..
dishaa shuul saanso sab ṭaalyo, jikar jogaṇii laaraa. sanamukh chand sudhaa ras piyo, is vidh kaaraj saaraa .. १ ..
kanṭak jog judh sab hii ṭaalyo, liv dham pulaa boho sadhaaii. aḍad uuḍad ko diyo dugaḍiyo, pichham gel ham paaii .. २ ..
siddh jog bhed pakaḍaayo, saansaa kaal ham paalyaa. din kaal kalesh sab meṭar, pichham dishaa ne chaalyaa .. ३
iimarat jog dvaadas aagal, jyaan ham suurat lagaaii. kah sukharaam uulaṭ chaḍh gaḍh men, piiv parasiiyaa maanii ..४..
महाराज फरमाते हैं कि जो साधक मोरथ (आध्यात्मिक मार्ग) पर चलता है, उसे आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं। उसी प्रकार सतगुरु से भेद लेकर भजन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही सब सिद्ध कारज किया है। सब सोच-फिक्र छोड़ना ही दिशाशूल को टालना है। जिक्र यानी व्यर्थ के राग-द्वेष छोड़ना ही जोगणी को लारा रखना है। सतगुरु विधि से भजन कर आनंद लेना ही सन्मुख चंद्र सुधारस पीना है। इस विधि से जन्म-मरण का रोग मिटना ही कारज सरना है। व्यर्थ के लड़ाई-झगड़ों को छोड़ना ही कंटक जोग टालना है। लिव बंध भजन होना ही पुला साधना है। उठते-बैठते श्वास में भजन करना ही अडद-उडद का दुगड़िया है। बंकनाल के रास्ते से शब्द उलटना ही पिछम गेल हम पाई है। सतगुरु सुखराम जी महाराज की अणभै वाणी ने भजन का भेद बताया, यही सिद्ध जोग है। एक भी श्वास भजन बिना खाली नहीं जाना ही श्वास काल पालना है। थारी-मारी से क्लेश होता है उसे छोड़ना ही दिनकाल क्लेश मेटना है। शब्द का बंकनाल में उलटना ही पश्चिम दिशा में चलना है। त्रिकुटी तख्त पर शब्द का अनुभव करना ही अमृत जोग द्वादश आंगल है। महाराज फरमाते हैं कि बंकनाल में उलटकर केवल पद आनंद पद की प्राप्ति करना ही गढ़ पर चढ़कर पीव को परसना है।