Thursday, November 20, 2025

Prabhujī maĩ kiskā śarnā dhārũ प्रभुजी मैं किसका शरणा धारूं।_ हरजस पद राग आसा (३१) प्रभुजी मैं किसका शरणा धारूं। भोलप मांही किया गुरु चारी, को तज किस बिन सारूं ॥ टेर ॥ कृपा कर हमारे मांही, नाम केवल हरी आया। ता पीछे गुरु भोलप मांही, लालदास कूं गाया ॥ १ ॥ बाणी कहूं रीत बोहो भारी, शब्द पिछम दिस धावे। तब मैं छाड लाल कूं दिया, बुज्या अरथ न आवे ॥ २ ॥ रामदास के दरशण आया, पूजा टेल चढाई। तब जन राम बुजणे लागा, को गुरु तेरा भाई ॥ ३ ॥ तब मैं कहयो गुरु है बीरम, निज पद मोहि बताया। मेरे रीत बणी है ऐसी, मैं परखावण आया ॥ ४ ॥ जब जन रामदासजी बोल्या, रीत पकी है थारी। यां को भेद आज्ञा सुण लिया, बोहोत बणेगी भारी ॥ ५ ॥ बीरमदासजी यांही का चेरा, इशा भेव मुज दिया। जब मैं जाय सुणयो भाई ओसी, रामदास गुरु किया ॥ ६ ॥ बुज्या बात बीरमजी खीज्या, जाब मुझको दिया। मुझ कूं करे ढेढ को चेलो, दगो रामदास किया ॥ ७ ॥ चारी गुरू इसी विध किया, सुणो संत सब कोई। अडबी पडी न्याव सब किजे, सतगुरु कहो कुण होई ॥ ८ ॥ मेरे बस कछु अब नांही, बात गई है फेली। हर जन साध संत सुण साहेब, राम करे सो व्हेली ॥ ९ ॥ मैं मत हीण बुध सुण ओछी, अकल नहीं तन मांही। कह सुखराम रखे जा रूलां, सुण हो आद गुंसाई ॥ १० ॥ Harjas Pad Rāg Āsā (31) Prabhujī maĩ kiskā śarnā dhārũ. Bholap mā̃hī kiyā guru chārī, ko taj kis bin sārũ. ṭer ॥ Kṛpā kar hamāre mā̃hī, nām keval Harī āyā. Tā pīche guru bholap mā̃hī, Lāldās kũ gāyā. ॥ 1 ॥ Bāṇī kahũ̃ rīt bohot bhārī, śabd picham dis dhāve. Tab maĩ chhāḍ Lāl kũ diyā, bujyā arth na āve. ॥ 2 ॥ Rāmdās ke darśan āyā, pūjā tel chaḍāī. Tab jan Rām bujhaṇe lāgā, ko guru terā bhāī. ॥ 3 ॥ Tab maĩ kahyo guru hai Bīram, nij pad mohi batāyā. Mere rīt baṇī hai aisī, maĩ parkhāvaṇ āyā. ॥ 4 ॥ Jab jan Rāmdāsjī bolyā, rīt pakī hai thārī. Yā̃ ko bhed ājñā suṇ liyā, bohot baṇegī bhārī. ॥ 5 ॥ Bīramdāsjī yā̃hī kā cherā, īśā bhāv muj diyā. Jab maĩ jāy suṇyo bhāī osī, Rāmdās guru kiyā. ॥ 6 ॥ Bujyā bāt Bīramjī khījyā, jāb mujhko diyā. Mujh kũ kare ḍheḍ ko chelo, dago Rāmdās kiyā. ॥ 7 ॥ Chārī guru isī vidh kiyā, suṇo sant sab koī. Aḍbī paḍī nyāv sab kije, Satguru kaho kũ hoī. ॥ 8 ॥ Mere bas kuch ab nāhī̃, bāt gaī hai pheli. Har jan sādh sant suṇ sāheb, Rām kare so vhēlī. ॥ 9 ॥ Maĩ mat hīṇ budh suṇ ochī, akal nahī̃ tan mā̃hī. Kah Sukhārām rakhe jā rūlā̃, suṇ ho ād guṃsāī. ॥ 10 ॥ महाराज परमात्मा से प्रार्थना कर रहे हैं कि मैं किसको गुरु मानूँ। भोलेपन में मैंने चार गुरु किए हैं, किसे छोडूँ और किसे मानूँ। परमात्मा की कृपा से केवल नाम, यानी परमात्मा का निज नाँव 'नेः अँच्छर', कुदरती से ही जन्मते ही जागृत हो गया। यही नाँव केवल हरि आया है। उसके बाद कुटुम्ब के गुरु लालदासजी थे, उनको धारण किया और परखाने को गये। केवल नाम के प्रताप से बाणी कहने लगे और शब्द पिछम दिशा में अनुभव होने लगा, तब मैंने लालदासजी से उसका भेद पूछा तो वो नहीं बता सके, इसलिए मैंने उनको छोड़ दिया। रामदासजी के दर्शन करने गये, उनके भेंट-पूजा चढ़ाई, तब रामदासजी ने पूछा तुम्हारा गुरु कौन है। तब मैंने कहा बीरमदासजी मेरे गुरु हैं, यानी बीरमदासजी से १८०१ में भक्ति का गुण लगा व १८२४ में बीरमदासजी ने सुरत शब्द का ज्ञान कराया, फिर निज पद, केवल पद, आनंद पद में मिलने का भेद बताया है। मेरा साधन ऐसा है सो मैं आपको परीक्षा कराने के लिए आया हूँ। रामदासजी ने कहा तुम्हारा साधन सही है, यहाँ से आज्ञा लेने पर और अच्छी बनेगी। रामदासजी ने कहा बीरमदासजी यहीं के शिष्य हैं। मैंने जब ऐसी बात सुनी तब रामदासजी को गुरु माना, यानी शब्द सुरत का ज्ञान पूछा। यह बात मैंने बीरमदासजी महाराज को कही, तब उन्होंने गुस्से में आकर नाराज होकर मुझे कहा कि मेरे को ढेड का शिष्य कहता है। यह सब रामदासजी ने झूठ कहा है। इस तरह चार गुरु किए हैं। सब ही संत सुनो, इसका न्याय आप करो कि किसे सतगुरु मानूँ। मेरे बस में अब कुछ नहीं है। बात सब जगह प्रकट हो गई है। हरिजन संत साध आप सब सुनो, जो रामजी करेंगे वो ही होगा। मैं मतिहीन, मेरी बुद्धि छोटी है, मेरे शरीर में अक्ल नहीं है। महाराज फ़रमाते हैं कि हे रामजी सुनो, जिस तरह आप रखोगे वैसे ही मैं रहूँगा।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...